STF की बडी कार्यवाही: धार्मिक ट्रस्ट की आड़ में बड़ा साइबर फर्जीवाड़ा किया उजागर
आगरा। धार्मिक और सामाजिक सेवा का मुखौटा पहनकर बड़े पैमाने पर आर्थिक धोखाधड़ी किए जाने का खुलासा हुआ है। STF और एटीएफ की संयुक्त कार्रवाई में सामने आया कि एक कथित धार्मिक ट्रस्ट लखनऊ, देवरिया, बिहार और आगरा जैसी जगहों पर लगातार अपना ठिकाना बदलता रहा। यह बार-बार का स्थानांतरण इस बात का संकेत है कि ट्रस्ट केवल एक आवरण था, जबकि असल काम इसके नाम पर चल रहे बड़े वित्तीय खेल को छिपाना था।

STF इंस्पेक्टर यतीन्द्र शर्मा – ट्रस्ट के खाते बार-बार बदले जाते थे
STF इंस्पेक्टर यतीन्द्र शर्मा ने बताया कि ट्रस्ट हर कुछ समय में अपने पुराने बैंक अकाउंट बंद कर नए खाते खुलवाता था। इससे पैसे के प्रवाह का रिकॉर्ड बदल जाता था और जांच एजेंसियों से लेनदेन छिप जाता था। ट्रस्ट धार्मिक आयोजनों, गरीबों की मदद और दान के नाम पर छोटी-छोटी रकम इकट्ठा करता था, जिनकी बाकायदा रसीदें तक काटी जाती थीं, लेकिन इन पैसों का उपयोग असली धार्मिक कार्यों में नहीं बल्कि निजी आर्थिक लाभ और साइबर मनी के प्रबंधन में होता था।

आरोपियों के नाम फर्जीवाड़े का पूरा नेटवर्क
STF की जांच के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क में शामिल प्रमुख आरोपी ये हैं—
- रवि प्रकाश
निवासी – बहादुरपुर, देवरिया (गिरफ्तार) - अजय उर्फ़ रूपेश
निवासी – सेक्टर-4, आवास विकास, बोदला, आगरा (फरार) - एजाज़
निवासी – पुनित अपार्टमेंट, जयपुर हाउस, आगरा (फरार)
इन तीनों पर ट्रस्ट के नाम पर फर्जी पहचान, बैंक खातों पर कब्जा, दान राशि की हेराफेरी और साइबर फंड के लेनदेन में शामिल होने के आरोप हैं।
पीड़ितों को सेवा के नाम पर जोड़ा गया, फिर मारपीट और दबाव शुरू हुआ
इंस्पेक्टर शर्मा ने बताया कि शिकायतकर्ता ललित कुमार गर्ग और सतीश सिंघल जैसे कई लोगों को “धार्मिक सेवा” और “गरीबों की मदद” के नाम पर पहले ट्रस्ट से जोड़ा गया। कुछ समय बाद अजय ने उन पर दबाव बनाना शुरू किया, यहां तक कि मारपीट तक की गई। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि आरोपी उन्हें यह कहकर बहकाते थे कि “सरकार से पैसा आने वाला है”, जिससे वे ट्रस्ट पर विश्वास करते गए और अपने निजी दस्तावेज़ साझा कर बैठे।

50 हजार रुपये की चाल,खातों और दस्तावेज़ों पर पूरा कब्जा
पीड़ितों ने बताया कि अजय ने “मदद” के नाम पर ₹50,000 दिए और इसी रकम को बाद में दबाव का माध्यम बनाकर उनके खातों और दस्तावेज़ों पर कब्जा कर लिया। उनसे पहले ही चेकबुक पर साइन करवा लिए जाते थे और बताया जाता था कि सरकारी राशि आने पर उन्हें बड़ा हिस्सा मिलेगा। इसी तरह धीरे-धीरे उनके बैंक, मोबाइल नंबर और पहचान से जुड़े दस्तावेज़ पूरी तरह आरोपियों के नियंत्रण में चले गए।
झारखंड और नोएडा से आने वाले साइबर फंड का बड़ा खुलासा
जांच में सामने आया कि इस धार्मिक ट्रस्ट की गतिविधियों में साइबर फ्रॉड से आने वाली रकम का बड़ा हिस्सा शामिल था। झारखंड और नोएडा के साइबर नेटवर्क से आने वाला पैसा ट्रस्ट के खातों में आता था, फिर आगे अलग-अलग फर्जी खातों में ट्रांसफर कर कैश में निकाला जाता था। कई जिलों में इस नेटवर्क की सक्रियता का संदेह जताया गया है।
पीड़ितों के नाम पर जारी करवाए गए SIM कार्ड और OTP कंट्रोल भी उन्हीं के पास
शिकायतकर्ताओं ने बताया कि आरोपी उनके नाम से नए सिम कार्ड जारी करवा लेते थे। बैंक OTP, मोबाइल बैंकिंग ऐप और वेरिफिकेशन कॉल्स का पूरा नियंत्रण उन लोगों के पास रहता था। इसी तरह आरोपी बैंक खातों से रकम निकालने, फर्जी ट्रांसफर करने और साइबर फंड मैनेज करने का काम करते थे।
पीड़ितों ने आरोप लगाया कि ललित के नाती के मामले में लगभग ₹5 लाख खर्च हो गए थे इस दौरान उसकी सहायता की बात कहकर उन पर अलग से आर्थिक दबाव बनाया गया। यह दबाव उनके मानसिक शोषण का हिस्सा था, जिससे वे ट्रस्ट के लोगों के निर्देशों का पालन करने को मजबूर हो गए।
बरामदगी पूरे फर्जी नेटवर्क का डिजिटल सबूत
STF की कार्रवाई में जो सामान बरामद हुआ, उससे पूरे नेटवर्क का ढांचा स्पष्ट हो गया। मौके से मिले सामान में शामिल हैं
- 24+ ATM कार्ड (SBI, Indian Bank, IDBI, HDFC, Bandhan Bank, Ujjivan Bank, IndusInd, Yes Bank आदि के)
- कई बैंक पासबुक
- 32 फर्जी प्लास्टिक कार्ड
- आधार कार्ड और पैन कार्ड (भिन्न-भिन्न नामों से)
- लैपटॉप
- कई मोबाइल फोन (IMEI दर्ज)
- सिम कार्ड
- 10,000 रुपये नकद
- चेकबुक, नोट्स, रसीदें और दान रजिस्टर
बरामद सामग्री बताती है कि आरोपी अलग-अलग पहचान का उपयोग कर बैंक खातों के जरिए भारी रकम घुमाते थे।
STF की कार्रवाई जारी, गिरोह से जुड़े और नाम सामने आने की संभावना
इंस्पेक्टर यतीन्द्र शर्मा ने बताया कि ट्रस्ट और आरोपियों से जुड़े दर्जनों खातों, सिम कार्डों और दस्तावेज़ों की जांच जारी है। फरार आरोपी अजय उर्फ़ रूपेश और एजाज़ की तलाश में दबिशें चल रही हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह मामला केवल धार्मिक ट्रस्ट तक सीमित नहीं, बल्कि एक बड़े साइबर-वित्तीय रैकेट से जुड़ा हो सकता है।
