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सरकारी भूमि पर ‘सांठगांठ का खेल’? नगर निगम की लापरवाही से अरबों की जमीनें हाथों-हाथ: पूर्व पार्षद ने सीएम को भेजी शिकायत

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बसई मुस्तकिल की जमीनों पर अवैध कब्जों का बड़ा खुलासा, निगम कर्मचारियों पर गलत शपथपत्र देकर भूमि माफियाओं को फायदा पहुँचाने का आरोप

आगरा। आगरा नगर निगम के अंतर्गत आने वाली मौजा बसई मुस्तकिल की सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों और संदिग्ध बिक्री का एक गंभीर प्रकरण सामने आया है। पूर्व पार्षद अरुण प्रकाश राठौर ने मुख्यमंत्री को भेजे गए विस्तृत शिकायत पत्र में आरोप लगाया है कि नगर निगम के संपत्ति विभाग और विधि विभाग के कर्मचारियों ने भूमाफियाओं के साथ सांठगांठ कर करोड़ों की जमीनों को निजी हाथों में जाने दिया

राठौर के अनुसार, राजस्व अभिलेखों में त्रुटिवश इन भूमियों का मालिकाना हक श्री ठाकुर रंगजी महाराज, वृंदावन के नाम दर्ज है, जबकि हकीकत में यह भूमि पूरी तरह लोक प्रयोजन रास्ते, तालाब, मरघट, जल प्रणाली, पुलिस चौकियां और निगम अस्पताल के लिए नियत है। लेकिन न्यायालयों में दाखिल गलत जानकारी ने सरकारी पक्ष की स्थिति कमजोर कर दी।

निगम के शपथपत्रों ने बदल दिया मामला?

शिकायत में दावा है कि अदालतों में नगर निगम की ओर से दाखिल किए गए शपथपत्रों में यह कहा गया कि
“उक्त भूमि नगर निगम संरक्षित नहीं है।”

यही लाइन कई मामलों में अदालत के निर्णयों की आधारशिला बनी और भूमाफियाओं को सरकारी भूमि पर कब्जा करने तथा अवैध बिक्री करने का रास्ता मिल गया।

शिकायतकर्ता का कहना है
“सरकारी कर्मचारियों की लापरवाही व मिलीभगत से अब तक कई अरब रुपये मूल्य की भूमि भूमाफियाओं के कब्जे में जा चुकी है।”

जांच का विषय: पुलिस चौकियों और अस्पताल की जमीनें भी ‘हथियाई’ गईं

मामला और गहरा है। आरोप है कि माफियाओं ने न केवल खाली पड़ी सरकारी भूमि बल्कि काबिज सरकारी परिसंपत्तियों को भी नहीं छोड़ा।

राठौर के अनुसार

  • बसई पुलिस चौकी (फतेहाबाद मार्ग) की भूमि
  • नगर निगम जच्चा खाना अस्पताल
  • ताजगंज निगम डिस्पेंसरी
  • फतेहाबाद रोड की कई अन्य जमीनें

इन सब पर अवैधानिक पट्टे, गलत अभिलेख और लचर पैरवी के जरिये कब्जे की कार्रवाई दर्ज है।

विशेष रूप से दर्ज द्वितीय अपील संख्या 178/2018 को निगम की लापरवाही का जीवंत उदाहरण बताते हुए कहा गया है कि केस हिस्ट्री पढ़ने भर से पूरा ‘तंत्र’ कटघरे में खड़ा नजर आता है।

कमजोरों के रास्ते भी बंद, विवाद बढ़ने की आशंका

शिकायत में कहा गया है कि भूमाफियाओं ने कई गरीब और कमजोर परिवारों के घरों के सामने तक अवैधानिक पट्टे बनवाकर रास्तों को निजी कब्जों में बदल दिया, जिसके कारण क्षेत्र में झगड़े, विवाद और लोक शांति भंग होने की स्थिति बन रही है।

क्या यह प्रदेश का बड़ा भूमि घोटाला है?

पूर्व पार्षद का दावा है कि यदि इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, तो यह उत्तर प्रदेश के इतिहास के बड़े भूमि घोटालों में से एक साबित हो सकता है।
भू-स्वामित्व कानूनी रूप से उत्तर प्रदेश सरकार में निहित होने के बावजूद निगम कर्मियों द्वारा न्यायालयों में गलत तथ्य प्रस्तुत किए जाने की वजह से सरकारी जमीनें लगातार माफियाओं के हाथों में चली गईं।

सीएम से मांग: दोषियों पर कार्रवाई और भूमि का पुनः अधिग्रहण

पत्र में मुख्यमंत्री से मांग की गई है कि

  • दोषी नगर निगम व राजस्व कर्मियों की तत्काल जाँच
  • न्यायालयों में गलत तथ्यों के आधार पर लिए गए निर्णयों के विरुद्ध सरकारी पक्ष की प्रभावी पैरवी
  • सभी लोक प्रयोजन की जमीनों को सरकार के नाम चढ़ाने की प्रक्रिया
  • अवैध कब्जों से भौतिक कब्जा वापस लेने की कार्रवाई

“ताजगंज की जनता न्याय की प्रतीक्षा कर रही है और मुख्यमंत्री से कड़े कदमों की अपेक्षा “

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