नगर निगम आगरा में सियासी विस्फोट: पार्षद हेमंत कुमार प्रजापति का सीधा हमला,: टेंडर खेल और दबाव की राजनीति पर उठाए बड़े सवाल
मानवेन्द्र मल्होत्रा
आगरा नगर निगम इन दिनों सिर्फ प्रशासनिक फैसलों का केंद्र नहीं, बल्कि एक ऐसे सियासी रणक्षेत्र में बदल चुका है जहाँ आरोप, प्रत्यारोप और जवाबदेही की मांग आमने-सामने खड़ी है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हैं भाजपा पार्षद दल के सचेतक हेमंत कुमार प्रजापति, जिन्होंने नगर आयुक्त की कार्यशैली पर न केवल सवाल उठाए, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता को कटघरे में खड़ा कर दिया।
23 मार्च को बुलाई गई नगर निगम सदन की बैठक—जो लोकतांत्रिक संवाद का मंच होनी चाहिए थी—वह खुद सवालों के घेरे में आ गई। बैठक में अधिकारियों की गैरमौजूदगी को प्रजापति ने महज एक संयोग नहीं, बल्कि “सच से बचने की रणनीति” करार दिया। उनका दावा है कि जिन टेंडरों पर चर्चा होनी थी, वही इस पूरे विवाद की जड़ हैं।
करीब 450 से अधिक कार्यों की टेंडर प्रक्रिया पर उंगली उठाते हुए प्रजापति ने आरोप लगाया कि नियमों को दरकिनार कर “चहेते ठेकेदारों” को लाभ पहुंचाया गया। यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के पैसों के साथ गंभीर खिलवाड़ है—ऐसा उनका स्पष्ट संदेश रहा।
मामला यहीं नहीं थमा। सदन में उठे सवालों के बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ तब लिया, जब कथित रूप से एक तहरीर के जरिए पार्षदों और उनके परिजनों को संदिग्ध बताने की कोशिश हुई। हालांकि बाद में यह तहरीर वापस लेनी पड़ी, लेकिन इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक मंशा पर और भी गहरे सवाल खड़े कर दिए।
प्रजापति का आरोप है कि इसके बाद उन पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की कोशिश की गई—उनके वार्ड में तैनात सफाई कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। नवरात्र जैसे पावन समय में उठाया गया यह कदम उन्होंने “गरीबों के पेट पर सीधा प्रहार” बताया।
नगर निगम में अचानक बढ़ाई गई सुरक्षा व्यवस्था और दस्तावेजों तक पहुंच पर नियंत्रण को भी उन्होंने “सवालों से बचने की कवायद” करार दिया। उनके शब्दों में, “जब जवाब देना मुश्किल हो, तो दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं।”
अपने तेवर साफ करते हुए प्रजापति ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे किसी भी दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जरूरत पड़ने पर मामला उच्च न्यायालय तक ले जाया जाएगा, लेकिन जनता के पैसे का हिसाब लेकर रहेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम ने आगरा की सियासत में एक बड़ा संदेश दिया है—अब सवाल सिर्फ आरोपों का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है। और जब जनता का पैसा दांव पर हो, तो हर चुप्पी खुद एक बड़ा सवाल बन जाती है।
