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अतिक्रमण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 90 दिनों में हटेंगे अवैध कब्जे!: ​तालाब, जलाशय और सार्वजनिक जमीन को कब्जा मुक्त कराने का आदेश; लेखपाल, प्रधान और तहसीलदार की जिम्मेदारी तय

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प्रयागराज:

उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक जमीनों — जैसे तालाब, पार्क, खेल के मैदान, सड़कें और अन्य जलाशय (पानी जमा होने की जगहें) पर बढ़ते गैरकानूनी कब्जों के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका (Public Interest Petition) पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सख्त और ऐतिहासिक फैसला दिया है।
यह आदेश पूरे प्रदेश में अतिक्रमण (कब्जा) हटाने की कार्रवाई को तेज करेगा और लापरवाही करने वाले अफसरों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।

अदालत ने कहा कि सरकारी अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद तालाबों, पार्कों और पानी वाली जमीनों पर कब्जे लगातार बढ़ रहे हैं, जो बेहद चिंता की बात है।


कोर्ट के मुख्य आदेश:

  1. 90 दिन में कार्रवाई पूरी करें:
    कोर्ट ने कहा कि अतिक्रमण हटाने और जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया 90 दिनों के अंदर पूरी की जाए। इस दौरान सभी पक्षों को अपनी बात रखने का मौका दिया जाएगा।
  2. लेखपाल और प्रधान की जिम्मेदारी:
    60 दिन का समय: हर गांव का लेखपाल (जो जमीन की देखरेख करता है) और ग्राम प्रधान (गांव के मुखिया) को आदेश की तारीख से 60 दिन के भीतर अपने इलाके की सभी कब्जा की गई जमीनों की रिपोर्ट तहसीलदार को देनी होगी।
    लापरवाही पर सजा: अगर ऐसा नहीं किया गया तो इसे लापरवाही और विश्वासघात (धोखाधड़ी) माना जाएगा, और इनके खिलाफ विभागीय और आपराधिक कार्रवाई होगी।
  3. तहसीलदार पर भी कार्रवाई:
    अगर तहसीलदार (जो राजस्व मामलों का अफसर होता है) किसी अतिक्रमण के केस में 90 दिन के अंदर सुनवाई और आदेश नहीं देता, तो उसके खिलाफ भी सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
  4. पुलिस को पूरा सहयोग देना होगा:
    कोर्ट ने राज्य के सभी पुलिस अधिकारियों को आदेश दिया है कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में वे राजस्व विभाग के अफसरों की पूरी मदद करें और सुनिश्चित करें कि कार्रवाई शांतिपूर्वक पूरी हो।
  5. सूचना देने वाले को जानकारी मिलेगी:
    जिसने अतिक्रमण की शिकायत दी है, उसे हर कदम पर कार्रवाई की जानकारी दी जाएगी और जरूरत पड़ने पर सुनवाई में उसे भी सुना जाएगा।
  6. वरिष्ठ अफसर करेंगे निगरानी:
    इस आदेश का पालन कराने के लिए अपर मुख्य सचिव, आयुक्त और जिलाधिकारी (DM) को जिम्मेदार बनाया गया है।
    हर साल डीएम और आयुक्त को मुख्य सचिव को रिपोर्ट भेजनी होगी कि किन कब्जों को हटाया गया और किन अफसरों पर कार्रवाई की गई।

फैसले का असर:

इस फैसले के बाद सरकारी और सार्वजनिक जमीनों, खासकर तालाबों और जलाशयों, को कब्जे से मुक्त कराने की प्रक्रिया तेज होगी।
सबसे अहम बात यह है कि अब लेखपाल, प्रधान और तहसीलदार की सीधी जिम्मेदारी तय कर दी गई है।
अगर वे अपने काम में लापरवाही करेंगे, तो उन्हें नौकरी से हटाया भी जा सकता है और मुकदमा भी झेलना पड़ सकता है।


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