कारगिल विजय दिवस: आगरा के वीर हवलदार हरिपाल सिंह सोलंकी की कहानी—“जहां तिरंगा, वहीं जान कुर्बान”
(लेख: कर्नल जी.एम. ख़ान द्वारा हवलदार हरिपाल सिंह सोलंकी के विशेष साक्षात्कार पर आधारित)
रात का अंधेरा था। कारगिल की बर्फीली चोटियों पर हड्डियों को चीरती ठंडी हवा चल रही थी। हर तरफ़ सिर्फ़ खामोशी और मौत का साया। इसी सन्नाटे में हवलदार हरिपाल सिंह सोलंकी और उनके साथी दुश्मन की चौकियों की ओर बढ़ रहे थे। उनके हाथों में हथियार थे, लेकिन दिल में सिर्फ़ एक संकल्प—भारत माता की रक्षा।
“दुश्मन की गोलियां सामने से बरस रही थीं, मौत पीछे खड़ी थी, लेकिन हमारी पलकों पर सिर्फ़ तिरंगा था,” हरिपाल आज भी उस रात को याद करते हैं।
नैनाना जाट से कारगिल तक
आगरा के नैनाना जाट गांव में जन्मे हरिपाल 1995 में सेना में भर्ती हुए। 22 ग्रेनेडियर्स बटालियन से उनका सफर शुरू हुआ।
“हमारी बटालियन में हर जाति और धर्म के लोग थे—अहीर, जाट, मुस्लिम, मीणा। लेकिन वर्दी पहनते ही सब मिट जाता है। वहां सिर्फ़ एक पहचान रहती है—हम भारतीय सैनिक हैं,” वे गर्व से कहते हैं।
कारगिल का बुलावा
31 मई 1999। आदेश आया—कारगिल के मोर्चे पर रवाना होना है।
हैदराबाद से जम्मू की ओर बढ़ती ट्रेन में हर स्टेशन पर उमड़ता जनसैलाब हरिपाल की स्मृतियों में दर्ज है।
“लोग हमें खाना, पानी और आशीर्वाद दे रहे थे। बच्चों की आंखों में विश्वास था—कि हम उन्हें सुरक्षित रखेंगे। वह प्रेम हमारी सबसे बड़ी ताकत बना,” हरिपाल भावुक होकर कहते हैं।
युद्धभूमि का सच
कारगिल पहुंचते ही असली परीक्षा शुरू हुई। 16,000 फीट की ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी, हड्डियां जमा देने वाली ठंड, और हर तरफ़ दुश्मन की गोलियां।
एक दिन दुश्मन का गोला उनकी पलटन पर गिरा।
“हमारे साथी हवलदार अमरुद्दीन ने हमें बचाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उनके शरीर के टुकड़े हमारे सामने बिखर गए… आज भी वह दृश्य दिल में धंसा हुआ है,” हरिपाल की आंखें नम हो जाती हैं।
प्वाइंट 5287 की भीषण लड़ाई
बटालिक सेक्टर की प्वाइंट 5287 (खालूबार रिज) दुश्मन के कब्जे में थी। इस चोटी को मुक्त कराना बेहद जरूरी था।
भारतीय सैनिकों ने रात के अंधेरे में तीन दिशाओं से हमला बोला। पाकिस्तानी सेना ने जवाब में दो हेलीकॉप्टर उतारे। गोलियों और तोपों की बारिश में हरिपाल और उनके साथी आगे बढ़ते रहे।
“हमें पता था कि एक कदम पीछे हटे तो नीचे खाई है और आगे दुश्मन। पीछे हटने का सवाल ही नहीं था,” वे कहते हैं।
बोफोर्स तोपों की गड़गड़ाहट और मेजर अजीत सिंह की अगुवाई में भारतीय सैनिकों ने चोटी पर तिरंगा फहराया।
लेकिन यह जीत बलिदानों से सनी थी—आगरा के हसन मोहम्मद समेत दस जवान वीरगति को प्राप्त हुए।
“हसन की शादी को कुछ ही दिन हुए थे। आज भी सिकंदरा का ‘कारगिल पेट्रोल पंप’ उनकी शहादत का प्रतीक है,” हरिपाल गर्व और दर्द के मिले-जुले स्वर में कहते हैं।
काली पहाड़ी पर विजय
इसके बाद हरिपाल और नायक टीपू सुल्तान को काली पहाड़ी पर रणनीतिक हमला करना था। बर्फ़ीले तूफान और खड़ी चढ़ाई में आगे बढ़ना जानलेवा था। लेकिन हरिपाल कहते हैं,
“स्थानीय लद्दाखी नागरिकों ने अपने जीवन की परवाह किए बिना हमें रास्ता दिखाया। उनका सहयोग अमूल्य था।”
अंततः काली पहाड़ी पर भी भारतीय सेना का परचम लहराया।
कारगिल का सबक
कारगिल युद्ध ने हरिपाल को एक अमिट सत्य सिखाया—“जाति-धर्म से ऊपर सिर्फ़ देश है।”
वे आज की युवा पीढ़ी से कहते हैं—
“अगर हम अनुशासन और एकता से काम करें, तो भारत की ताकत अजेय है। कारगिल के हर शहीद का सपना यही है।”
वीरता की अमिट कहानी
आज, हवलदार हरिपाल सिंह सोलंकी की गाथा आगरा का नहीं, पूरे भारत का गौरव है। उनके शब्द हर भारतीय के दिल में गूंजते हैं—
“हमने अपने खून से तिरंगा सींचा है। कारगिल की चोटियों पर गूंजता हर जयकारा याद दिलाता है—हमारे सैनिकों का बलिदान ही भारत की असली ताकत है।”
