आगरा

आगरा विश्वविद्यालय में ‘मरम्मत’ के नाम पर खेल:: टॉयलेट पर ही 5 करोड़, 3 साल में 17 करोड़ खर्च

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DNA विशेष | आगरा

डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में खर्च का ऐसा हिसाब सामने आया है, जिसने “मरम्मत” शब्द को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। आरटीआई से निकले दस्तावेज बताते हैं कि बीते तीन वर्षों में 17 करोड़ रुपये से ज्यादा राशि मरम्मत और सौंदर्यीकरण के नाम पर खर्च की गई और इनमें सबसे बड़ा हिस्सा शौचालयों पर गया।

कुलपति प्रो. आशुरानी के कार्यकाल में हुए इन खर्चों ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं क्या यह रखरखाव था या व्यवस्थित तरीके से धन की निकासी?

टॉयलेट बने ‘खर्च का टॉवर’

दस्तावेजों के अनुसार, सिर्फ शौचालयों की मरम्मत, पॉलिश और रंगाई-पुताई पर 4 से 5 करोड़ रुपये तक खर्च कर दिए गए।

  • छलेसर कैंपस: 8 शौचालय—20.60 लाख
  • खंदारी (सेठ पदमचंद जैन संस्थान): 6 शौचालय व कार्य—34.42 लाख
  • संस्कृति भवन: 10 शौचालय व वृहद मरम्मत—1.84 करोड़
  • निदेशक कक्ष व फ्लोर मरम्मत—32.70 लाख
  • रंगाई-पुताई—96.28 लाख

सवाल: क्या इन परिसरों की हालत इतनी खराब थी, या बिलों की हालत “बेहद बेहतर” बनाई गई?

नियम ताक पर, नई बिल्डिंग भी ‘बीमार’

आरटीआई आवेदन करने वाले अरुण दीक्षित का दावा है कि एक ऐसी बिल्डिंग, जिसे बने एक साल भी नहीं हुआ था, उसकी मरम्मत पर 18 लाख रुपये खर्च दिखाए गए।
जबकि नियम साफ कहते हैं निर्माण एजेंसी 1–2 साल तक मेंटेनेंस की जिम्मेदार होती है।

कॉन्फ्रेंस हॉल चमका, छत गिर गई

पालीवाल परिसर के बृहस्पति भवन में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग हॉल और फर्नीचर पर 47.38 लाख खर्च किए गए।
इसी बीच, विधि संकाय के भवन में फॉल सीलिंग भरभराकर गिर गई और एक कर्मचारी घायल हो गया।

तस्वीर साफ है जहां दिखाना था, वहां चमक; जहां टिकना था, वहां ढहाव।

बंद स्विमिंग पूल में भी ‘खर्च की तैराकी’

संस्कृति भवन का स्विमिंग पूल वर्षों से उपयोग में नहीं, फिर भी “बंदरों से बचाव” के नाम पर लाखों की जाली लगवाई गई।

NAAC से पहले करोड़ों की ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’

अगस्त 2024 में NAAC सर्वे से पहले ताबड़तोड़ काम पास किए गए:

  • निर्माण व सौंदर्यीकरण: 9.98 करोड़
  • शिवाजी मंडपम (लाइट एंड साउंड): 4.63 करोड़
  • साउंड प्रूफिंग व अन्य कार्य: 2.39 करोड़

यानी रेटिंग से पहले कैंपस की सूरत बदली गई—सीरत पर सवाल बरकरार हैं।

छात्र घटे, कोर्स बंद फिर भी खर्च बेहिसाब

करोड़ों खर्च के बावजूद छात्र पंजीकरण घट रहा है और कई कोर्स बंद हो चुके हैं।
तो क्या पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर से ज्यादा “कागज” पर लगा?

DNA की पड़ताल

  • खर्च असामान्य रूप से अधिक, खासकर टॉयलेट और पेंटिंग में
  • नई बिल्डिंग में भी मरम्मत—नियमों की अनदेखी का संकेत
  • निरीक्षण से पहले भारी खर्च—“इमेज मैनेजमेंट” की आशंका
  • जमीनी गुणवत्ता पर सवाल—छत गिरने की घटना से स्पषट

यह मामला सिर्फ अनियमितता नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक फाइनेंशियल मिसमैनेजमेंट की ओर इशारा करता है।
जरूरत है स्वतंत्र जांच, तकनीकी ऑडिट और जिम्मेदारी तय होने की ताकि “मरम्मत” के नाम पर चल रहे इस खेल का सच सामने आ सके।

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