टोरेंट के 431 करोड़ पर सियासी झूठ बनाम सरकारी सच:: कोई टैक्स ‘माफ’ नहीं हुआ, नियमों के खिलाफ की जा रही मांग को सरकार ने किया खारिज
मानवेन्द्र मल्होत्रा
आगरा नगर निगम और निजी बिजली कंपनी टोरेंट पावर के बीच ट्रांसफार्मर किराए के विवाद पर शासन का फैसला आते ही शहर की सियासत पूरी तरह गर्मा गई है। इस प्रशासनिक फैसले को लेकर अब राजनीतिक गलियारों में बयानों के तीर चलने शुरू हो गए हैं। विपक्ष और कुछ स्थानीय संगठनों का सीधा आरोप है कि नगर निगम ने टोरेंट पावर के करीब 431 करोड़ रुपए ‘माफ’ कर दिए हैं, जो कि जनता की गाढ़ी मेहनत की कमाई से टैक्स के रूप में वसूला गया पैसा था।
लेकिन, क्या वाकई यह कोई ‘टैक्स माफी’ है या फिर एक प्रशासनिक भूल का सुधार? जब इस मामले से जुड़े कानूनी और शासन के आधिकारिक दस्तावेजों की पड़ताल की गई, तो सियासत के दावों और जमीनी हकीकत में एक बड़ा फर्क साफ नजर आया।
क्या है राजनीतिक आरोप?
शहर के कुछ राजनीतिक गुटों और आलोचकों का कहना है कि नगर निगम को टोरेंट पावर से 431 करोड़ रुपए के करीब का राजस्व मिलना था। उनका दावा है कि यह पैसा शहर के विकास और जनता की सहूलियत के काम आ सकता था, लेकिन सरकार और निगम ने मिलकर एक निजी कंपनी को इतनी बड़ी रकम की खुली छूट (माफी) दे दी। इस पूरे मामले को विपक्षी पार्टियों कांग्रेस और सपा द्वारा जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा बताया जा रहा है।
सरकारी दस्तावेज और पुराना कानून क्या कहता है?
सियासी बयानों से इतर, शासन के नगर विकास विभाग द्वारा जारी आधिकारिक आदेशों और कानूनी पहलुओं को देखें, तो कहानी बिल्कुल उलट है। सच यह है कि सरकार ने कोई टैक्स या किराया ‘माफ’ नहीं किया है, बल्कि नगर निगम द्वारा गलत रूप से लगाए गए टैक्स (किराए की मांग) को ही शासन ने हटाने का आदेश दिया है।
इण्डियन इलेक्ट्रिसिटी एक्ट (भारतीय विद्युत अधिनियम):
इस पूरे मामले की जड़ में देश का पुराना और मुख्य बिजली कानून है। इसके प्रावधानों के मुताबिक, बिजली विभाग या उसकी अधिकृत एजेंसी को जनता तक बिजली पहुंचाने के लिए किसी भी स्थान पर मुफ्त में बिजली का खंभा, ट्रांसफार्मर या अन्य आवश्यक उपकरण लगाने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है। इस कानून के तहत स्थानीय निकायों को इस प्रकार के जनहित से जुड़े उपकरणों पर किराया वसूलने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है।
2001 और 2016 के शासनादेश:
यहाँ मामला यह था कि नगर निगम साल 2001 और 2016 के उन शासनादेशों का उल्लंघन करके टोरेंट से किराया मांग रहा था, जिसमें स्पष्ट लिखा है कि स्थानीय निकाय अपनी सीमा में लगे बिजली विभाग के ट्रांसफार्मरों पर कोई किराया नहीं ले सकते।
गैर-कानूनी थी मांग:
जब देश के बिजली कानून और पुराने सरकारी आदेशों के तहत निकायों को इन उपकरणों पर किराया वसूलने का हक ही नहीं है, तो नगर निगम द्वारा बनाई गई 431 करोड़ की यह काल्पनिक डिमांड (मांग) शुरू से ही कानूनी रूप से गलत और शून्य थी।
जनता के पैसे का कोई नुकसान नहीं
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा भ्रम यह फैलाया जा रहा है कि इसमें जनता की गाढ़ी कमाई का नुकसान हुआ है। तकनीकी रूप से, जनता द्वारा टैक्स के रूप में दिया गया एक भी पैसा न तो टोरेंट पावर को दिया गया है और ना ही निगम के खाते से घटा है। यह पूरा विवाद सिर्फ एक ऐसी कागजी रकम पर था, जिसे लगाने का हक ही आगरा नगर निगम के पास नहीं था।
शासन ने केवल देश के स्थापित कानून और अपनी पुरानी व्यवस्था को लागू करते हुए इस गलत मांग को वापस लेने का आदेश दिया है। राजनीतिक नफे-नुकसान के बीच इस कानूनी सुधार को ‘टैक्स माफी’ का नाम देकर भुनाने की कोशिशें तेज हैं, लेकिन कानून और फाइलों के सच के आगे ये दावे टिकते नहीं दिख रहे।
टोरेंट पावर आगरा के उपाध्यक्ष संजय कुमार ने बताया कि नगर निगम के द्वारा सदन में ट्रांसफार्मर एवं विद्युत पोलों का किराया लगाने का प्रस्ताव पास किया था और किराया लगाया था यह न्याय संगत नहीं था ! टोरेंट पावर ने शासन को प्रत्यावेदन किया उसके सापेक्ष में शासन के द्वारा लगाए गए किराए को वापस करने का आदेश दिया
