स्मोकिंग जोन भी नहीं बना पाएगा हुक्का सर्विस की ढाल, रेस्टोरेंट की ‘सेल्फ सर्विस’ और ‘किराए’ वाली दलीलें भी खारिज
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में हुक्के के धुएं पर अब कानून की सख्ती का शिकंजा और कस गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने साफ कर दिया है कि रेस्टोरेंट, कैफे या किसी अन्य प्रतिष्ठान में हुक्का बार नहीं चलाया जा सकता। इतना ही नहीं, प्रतिष्ठान के भीतर अलग से डिजाइनेटेड स्मोकिंग एरिया बना लेने के बाद भी ग्राहकों को हुक्का उपलब्ध कराने की अनुमति नहीं होगी। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान न करने वाले व्यक्ति को स्वच्छ हवा में सांस लेने का मौलिक अधिकार है और किसी कारोबारी प्रतिष्ठान के व्यापारिक हित के नाम पर इस अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अभ्देश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने हुक्का बार और रेस्टोरेंट में हुक्का सर्विस से जुड़ी याचिकाओं के समूह पर फैसला सुनाते हुए यह स्थिति स्पष्ट की। अदालत ने याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में हुक्का सर्विस देना COTPA और उससे जुड़े नियमों की व्यवस्था के विपरीत है।
स्मोकिंग एरिया बना तो भी नहीं मिलेगी छूट
हुक्का संचालकों की ओर से सबसे प्रमुख दलील यह थी कि यदि रेस्टोरेंट में निर्धारित स्मोकिंग एरिया मौजूद है तो वहां ग्राहक हुक्का पी सकता है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने 2008 के Prohibition of Smoking in Public Places Rules में वर्ष 2017 में किए गए संशोधन को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट के मुताबिक डिजाइनेटेड स्मोकिंग एरिया सामान्य प्रतिबंध से एक सीमित अपवाद है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वहां किसी प्रकार की सेवा उपलब्ध कराने की छूट मिल जाती है। 2017 के संशोधन के बाद ऐसे क्षेत्र में सेवा देने पर रोक है।
हुक्का तैयार करके देना भी ‘सर्विस’
याचिकाकर्ताओं ने यह रास्ता भी सुझाया कि रेस्टोरेंट सीधे हुक्का सर्व नहीं करेगा। उसका दावा था कि ग्राहक को हुक्का उपलब्ध करा दिया जाएगा और वह खुद उसका इस्तेमाल करेगा।
कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि हुक्का इस्तेमाल के लिए तैयार करने की प्रक्रिया अपने आप में साधारण सेल्फ सर्विस नहीं है। इसमें उपकरण को जोड़ना, बाउल में तंबाकू भरना, पानी डालना, फॉयल लगाना और कोयले की व्यवस्था करना जैसी कई प्रक्रियाएं शामिल हैं।
ऐसे में केवल प्रक्रिया का नाम ‘सेल्फ सर्विस’ रख देने से उसकी प्रकृति नहीं बदल जाती।
‘किराए पर हुक्का’ का मॉडल भी नहीं चला
याचिकाकर्ताओं की एक और दलील थी कि रेस्टोरेंट हुक्का बेच या सर्व नहीं कर रहा, बल्कि ग्राहक को उपकरण किराए पर उपलब्ध करा रहा है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने देखा कि वास्तविक व्यवस्था में प्रतिष्ठान की भूमिका सिर्फ उपकरण देने तक सीमित नहीं रहती। हुक्का तैयार करना, कोयला जलाना या बदलना, राख हटाना और उसके इस्तेमाल के दौरान उसे तैयार हालत में बनाए रखना जैसी गतिविधियां भी प्रतिष्ठान से जुड़ी होती हैं। इसलिए इसे केवल उपकरण किराए पर देने की व्यवस्था बताकर सेवा के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता।
कारोबार बनाम स्वच्छ हवा का अधिकार
फैसले में कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(g) के बीच संतुलन पर भी जोर दिया। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान नहीं करने वाले व्यक्ति का स्वच्छ हवा में सांस लेना मौलिक अधिकार है।
कोर्ट के अनुसार किसी प्रतिष्ठान का व्यापार करने का अधिकार ऐसा आधार नहीं हो सकता, जिसके सहारे दूसरे व्यक्ति के इस अधिकार को सीमित किया जाए।
हुक्का बार के लिए अलग लाइसेंस भी नहीं
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फूड सेफ्टी विभाग या नगर निकाय हुक्का बार संचालित करने के लिए अलग से ऐसा लाइसेंस जारी नहीं कर सकते, जो COTPA और उसके नियमों के विपरीत हो। यानी किसी प्रतिष्ठान के पास सामान्य रेस्टोरेंट या खाद्य कारोबार का लाइसेंस होने भर से हुक्का सर्विस की अनुमति नहीं मानी जा सकती।
पुलिस के कार्रवाई के अधिकार बरकरार
अदालत ने COTPA के तहत पुलिस की प्रवर्तन शक्तियों को भी बरकरार रखा। नियमों का उल्लंघन मिलने पर पुलिस तलाशी, जब्ती और संबंधित कानूनी कार्रवाई कर सकती है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से हुक्का सर्विस के खिलाफ आवश्यक कदम उठाने और उल्लंघन की स्थिति में प्रभावी दंड व्यवस्था पर विचार करने को भी कहा है।
फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को भी भेजने का निर्देश दिया गया है, ताकि आदेश के अनुपालन के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकें।
साफ संदेश यह है कि स्मोकिंग जोन का बोर्ड लगाकर हुक्का सर्विस जारी रखने का रास्ता अब नहीं बचा है। हाईकोर्ट ने हुक्का बार के संचालन और रेस्टोरेंट की ओर से हुक्का उपलब्ध कराने—दोनों को नियमों के दायरे में रखकर स्थिति स्पष्ट कर दी है।
