2024 में 33 लोकसभा सीटों के बाद सपा उत्साहित, भाजपा के लिए यूपी बचाना बड़ी चुनौती; कांग्रेस जमीन तलाशने में जुटी, बसपा और चंद्रशेखर बिगाड़ सकते हैं सियासी गणित

आगरा । देश की राजनीति का रास्ता अक्सर उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। 80 लोकसभा सीटों वाला यूपी जब करवट लेता है तो उसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देती है। इसीलिए 2027 का विधानसभा चुनाव सिर्फ यह तय नहीं करेगा कि लखनऊ की कुर्सी किसे मिलेगी, बल्कि इसके नतीजे 2029 की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय कर सकते हैं।

फिलहाल सबसे बड़ा मुकाबला भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच बनता दिखाई देता है। दोनों के लिए यह चुनाव महज सत्ता हासिल करने की लड़ाई नहीं है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बढ़ते राष्ट्रीय कद के बीच यूपी में भाजपा की जीत उनके राजनीतिक भविष्य को और मजबूती दे सकती है। दूसरी तरफ अखिलेश यादव के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को विधानसभा की सत्ता में बदलने का यह सबसे बड़ा मौका होगा।

5 से 33 सीटें, सपा को मिला नया आत्मविश्वास

2019 के लोकसभा चुनाव में सपा केवल पांच सीटों पर जीती थी। 2024 में पार्टी ने जबरदस्त वापसी करते हुए 33 सीटें जीत लीं।

इस प्रदर्शन ने अखिलेश यादव की PDA—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—रणनीति को नई राजनीतिक ताकत दी। सपा अब अपने परंपरागत मुस्लिम-पिछड़ा आधार से आगे गैर-यादव पिछड़ों और दलित मतदाताओं के बीच पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है।

पारिवारिक मोर्चे पर भी स्थिति बदली है। कभी अखिलेश और शिवपाल यादव के बीच का टकराव पार्टी की बड़ी कमजोरी बन गया था। अब दोनों एक साथ हैं और सपा पिछली अंदरूनी टूट से काफी हद तक बाहर निकल चुकी है।

कांग्रेस भी देख रही वापसी का मौका

2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी। इसके बावजूद 2027 से पहले पार्टी की सक्रियता बढ़ रही है।

युवाओं के रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, महंगाई और दूसरे मुद्दों को लेकर बनने वाले असंतोष में कांग्रेस अपने लिए राजनीतिक अवसर तलाश सकती है। हालांकि सोशल मीडिया या युवा वर्ग में दिखने वाली नाराजगी को सीधे चुनावी जनादेश मान लेना जल्दबाजी होगी।

कांग्रेस की असली परीक्षा यह होगी कि वह इस माहौल को बूथ स्तर के संगठन और वोट में कितना बदल पाती है।

बसपा कमजोर हुई तो उसका वोट जाएगा कहां?

यूपी की अगली सियासी लड़ाई का सबसे बड़ा सवाल बसपा के भविष्य से भी जुड़ा है। मायावती की पार्टी कभी यूपी की सत्ता तक पहुंची थी, लेकिन पिछले चुनावों में उसका जनाधार और सीटें तेजी से घटी हैं।

इसी खाली होती राजनीतिक जगह में चंद्रशेखर आजाद ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। उनकी संसदीय जीत ने दलित राजनीति में एक नए विकल्प की संभावना पैदा की है।

अगर बसपा और आजाद समाज पार्टी अलग-अलग मैदान में उतरते हैं तो कई सीटों पर दलित वोट का बंटवारा भाजपा-सपा के सीधे मुकाबले का परिणाम बदल सकता है।

योगी बनाम अखिलेश, लेकिन लड़ाई इससे कहीं बड़ी

भाजपा के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है तो अखिलेश यादव के सामने साबित करने की कि 2024 की सफलता सिर्फ लोकसभा चुनाव तक सीमित नहीं थी।

अखिलेश यदि PDA के जातीय-सामाजिक समीकरण को विधानसभा चुनाव में भी दोहरा लेते हैं तो भाजपा के लिए चुनौती बड़ी होगी। दूसरी ओर भाजपा हिंदुत्व, संगठन, लाभार्थी वर्ग, कानून-व्यवस्था और अपने मजबूत चुनावी नेटवर्क के सहारे इस समीकरण को तोड़ने की कोशिश करेगी।

इसलिए 2027 की लड़ाई केवल योगी बनाम अखिलेश नहीं होगी। असली युद्ध इस बात का होगा कि दलित किस तरफ जाता है, गैर-यादव पिछड़ा किसके साथ रहता है, युवा किस मुद्दे पर वोट करता है और छोटे दल किसका वोट काटते हैं।

उत्तर प्रदेश का फैसला लखनऊ की सरकार बनाएगा, लेकिन उसका संदेश दिल्ली तक जाएगा। 2027 का परिणाम ही बताएगा कि 2024 में बदला यूपी का सियासी समीकरण स्थायी बदलाव था या भाजपा एक बार फिर उसे पलटने में कामयाब होगी।

 

 

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