मुफ्त की दवा, आधी-आधी मलाई:: मरीजों की सेहत से खिलवाड़ कर खड़ा किया करोड़ों का ‘सैंपल सिंडिकेट’
दवा माफिया का नया खेल: ‘नॉट फॉर सेल’ मिटाया, केमिकल के दम पर कमाया
आगरा/अलीगढ़। जिन जीवनरक्षक दवाओं को कंपनियां मरीजों को मुफ्त वितरण (फिजिशियन सैंपल) के लिए तैयार करती हैं, वही दवाएं अब बाजार में मोटे मुनाफे पर बेची जा रही हैं। औषधि विभाग की हालिया कार्रवाई में एक ऐसे अंतरराज्यीय गिरोह का खुलासा हुआ है, जो मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स (MR), हॉकर और थोक विक्रेताओं की मिलीभगत से लंबे समय से सक्रिय था।
इस सिंडिकेट का तरीका बेहद सुनियोजित बताया जा रहा है। बाहरी राज्यों से लाई गई सैंपल दवाओं पर छपे ‘नॉट फॉर सेल’ को विशेष केमिकल से मिटा दिया जाता था। इसके बाद उन पर नए जाली लेबल और बाजार मूल्य (MRP) चस्पा कर उन्हें असली दवाओं की तरह बाजार में उतार दिया जाता था। जांच में सामने आया है कि इस धंधे से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा कंपनी प्रतिनिधियों और बिचौलियों में बंटता था, जबकि बाकी रकम अवैध सप्लाई चैन संभालने वाले वेंडरों तक पहुंचती थी।
आगरा से अलीगढ़ और रुड़की तक फैला नेटवर्क
जांच में यह भी सामने आया है कि मामला केवल सैंपल दवाओं की अवैध बिक्री तक सीमित नहीं था, बल्कि नामी कंपनियों के ब्रांड पर नकली दवाएं तैयार कराने का संगठित नेटवर्क भी सक्रिय था। आगरा की एक मेडिकल एजेंसी पर पड़े छापे के बाद कई अहम कड़ियां सामने आईं।
- अलीगढ़ के मुख्य आरोपी मयंक गुप्ता ने आगरा के फर्म संचालक सुरेंद्र गुप्ता को भारी मुनाफे का लालच देकर नेटवर्क से जोड़ा।
- असली दवाओं के बैच नंबर और प्रोडक्ट डिटेल का इस्तेमाल कर रुड़की स्थित एक फार्मास्युटिकल फर्म से हूबहू नकली दर्द निवारक दवाएं तैयार कराई गईं।
- प्राथमिक जांच में सामने आया है कि यह नेटवर्क उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान समेत पांच राज्यों में सक्रिय था।
जांच एजेंसियों के रडार पर पूरा सिंडिकेट
सहायक आयुक्त औषधि बृजेश यादव के मुताबिक शुरुआती जांच से साफ है कि यह कमीशन आधारित बड़ा नेटवर्क है, जिसमें दवा कंपनियों के कुछ प्रतिनिधियों की भूमिका भी संदिग्ध है। अब तक विभिन्न संदिग्ध दवाओं के 85 सैंपल जांच के लिए प्रयोगशाला भेजे गए हैं। रिपोर्ट आने के बाद मामले में मिलावट, धोखाधड़ी और अन्य गंभीर धाराएं बढ़ाई जा सकती हैं।
ऐसे चलता था पूरा खेल
पहले चरण में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स डॉक्टरों को वितरण के नाम पर कंपनियों से बड़ी मात्रा में सैंपल दवाएं हासिल करते थे। दूसरे चरण में हॉकर और बिचौलियों के जरिए इन दवाओं को अवैध गोदामों तक पहुंचाया जाता था, जहां उनकी पहचान मिटाकर नई पैकेजिंग की जाती थी। तीसरे चरण में बिना वैध बिल के इन दवाओं को मेडिकल स्टोर्स और ग्रामीण क्षेत्रों के दवा विक्रेताओं तक पहुंचाया जाता था, जहां उन्हें असली कीमत पर बेच दिया जाता था।
जांच एजेंसियों को आशंका है कि इस नेटवर्क के जरिए लंबे समय से करोड़ों रुपये का कारोबार किया जा रहा था और मरीजों की जान को सीधे खतरे में डाला जा रहा था।
