व्यवस्था के आगे ‘कीड़े-मकोड़े’ बने इंसान:: पैरों में इन्फेक्शन, बहन की मानसिक स्थिति खराब; न्याय के लिए दो युवक बने ‘कॉकरोच’
- रीढ़ की हड्डी टूटने पर सीएमओ ने घर बैठे दे दी लकवे की रिपोर्ट, टीबी न होने पर भी अस्पताल ने चला दिया टीबी का इलाज।
- व्हीलचेयर पर शिकायतों की कड़ियां लटकाकर और बदन पर ‘मैं हूँ कॉकरोच’ का पोस्टर चिपकाकर कलेक्ट्रेट पहुंचे पीड़ित।
आगरा।”साहब! जब व्यवस्था की नजरों में एक गरीब इंसान की औकात कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा कुछ नहीं है, तो फिर इंसानों की तरह गुहार क्यों लगाना? इसीलिए आज हम कॉकरोच बनकर आपके पास आए हैं।”
यह दर्दनाक और बेबसी से भरी आवाज उन दो बेबस युवकों की थी, जो सोमवार को जिला मुख्यालय पर अनोखे और कलेजा चीर देने वाले अंदाज में प्रदर्शन करने पहुंचे थे।
मिढ़ाकुर के जोगेंद्र अपनी व्हीलचेयर पर शिकायतों की लंबी लड़ियां लटकाए और बदन पर ‘मैं हूँ कॉकरोच’ का पोस्टर लगाए कलेक्ट्रेट पहुंचे, तो उनके साथ जयप्रकाश भी इसी बेबसी का चोला ओढ़े खड़े थे। दोनों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग और रसूखदारों की साठगांठ ने उनकी जिंदगी को नरक बना दिया है, लेकिन साल भर से भटकने के बाद भी कोई सुनने वाला नहीं है।
मजदूरी ने छीने पैर, सीएमओ की ‘कागजी’ जांच ने उजाड़ा घर
मिढ़ाकुर निवासी जोगेंद्र पहले कमर्शियल गाड़ी चलाकर अपने परिवार का पेट पालते थे। उनका आरोप है कि मिढ़ाकुर स्थित एम.एस. पब्लिक स्कूल के संचालक ने उनसे जबरन बेलदारी (मजदूरी) कराई। इसी दौरान छत का एक भारी पत्थर उनकी रीढ़ की हड्डी पर आ गिरा। स्कूल मालिक के कहने पर खेरिया मोड़ स्थित एक निजी अस्पताल में उनका ऑपरेशन तो हुआ, लेकिन वह हमेशा के लिए व्हीलचेयर पर आ गए।
हैरानी की बात यह है कि जब पीड़ित ने जिलाधिकारी से गुहार लगाई, तो सीएमओ (मुख्य चिकित्सा अधिकारी) कार्यालय ने बिना किसी शारीरिक जांच के, घर बैठे डाक से एक रिपोर्ट भेज दी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि जोगेंद्र को पहले से लकवा था और वह अपने घर पर गिरे थे।
इस झूठी रिपोर्ट के सदमे और आर्थिक तंगी के कारण जोगेंद्र की पत्नी भी उन्हें छोड़कर चली गई। आज स्थिति यह है कि इलाज के अभाव में जोगेंद्र के दोनों पैरों में जानलेवा इन्फेक्शन फैल रहा है और वह कलेक्ट्रेट में अपने जिंदा होने के सबूत के साथ न्याय की भीख मांग रहे हैं।
बिना टीबी के दे दी टीबी की दवा, मानसिक संतुलन खो बैठी बहन
दूसरा मामला सौफुटा रोड स्थित ‘श्रीजी हॉस्पिटल’ का है। कलेक्ट्रेट पहुंचे जयप्रकाश ने बताया कि डॉक्टरों ने उनकी बहन कविता को बिना टीबी हुए ही टीबी की हैवी डोज दे दी। जब बहन की हालत बिगड़ी, तो जयप्रकाश ने उसे एस.एन. मेडिकल कॉलेज सहित आगरा के छह बड़े अस्पतालों में दिखाया, जहां डॉक्टरों ने साफ कहा कि लड़की को टीबी थी ही नहीं।
गलत इलाज के कारण आज कविता अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है। जयप्रकाश ने बताया कि सीएमओ की जांच कमेटी ने डॉक्टरों को दोषी भी माना है, लेकिन रसूख के आगे कार्रवाई की फाइल दबा दी गई है। अब पीड़ित को थाने और कलेक्ट्रेट के चक्कर कटवाए जा रहे हैं और आरोपी डॉक्टर खुलेआम धमकियां दे रहे हैं।
बेबसी का नाम ‘कॉकरोच’
जब संवाददाताओं ने पीड़ितों से पूछा कि यह ‘कॉकरोच’ बनने का विचार दिमाग में कैसे आया, तो दोनों की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा, “एक-डेढ़ साल से अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। गरीब की कोई सुनवाई नहीं है। रसूखदारों की जैक-जुगाड़ के आगे हम कीड़े-मकोड़े ही तो हैं। बस यही दिखाने आए हैं कि साहब, अब तो हमारी सुध ले लो।”
फिलहाल, इस अनोखे प्रदर्शन ने जिला मुख्यालय के अधिकारियों को भी हैरत में डाल दिया है। देखना यह है कि इस संवेदनशील और दर्दनाक प्रदर्शन के बाद सोई हुई प्रशासनिक व्यवस्था जागती है या इन पीड़ितों को यूं ही सिस्टम के हाथों घिसटने के लिए छोड़ दिया जाएगा।
