आगरा में आईफोन से लूट, मोबाइल स्नैचिंग, खंदौली के वायरल वीडियो और अछनेरा हत्याकांड तक किशोरों की भूमिका के सवाल
आगरा। DNA संवाददाता।
जिस उम्र में हाथ में किताब, आंखों में सपने और दिमाग में भविष्य की योजनाएं होनी चाहिए, उसी उम्र में कुछ किशोर अपराध की घटनाओं से जुड़ रहे हैं। NCRB की Crime in India-2024 रिपोर्ट देशभर में किशोर अपराध की तस्वीर को लेकर चिंता बढ़ाती है। 2024 में किशोरों के खिलाफ 34,878 मामले दर्ज हुए, जबकि 2023 में यह संख्या 31,365 थी। यानी एक साल में 11.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इन मामलों में 42,633 किशोर पकड़े गए और उनमें 77.7 प्रतिशत 16 से 18 वर्ष की उम्र के थे।
उत्तर प्रदेश में हालांकि तस्वीर राष्ट्रीय आंकड़ों से अलग है। प्रदेश में किशोर अपराध के दर्ज मामले 2023 के 1,575 से घटकर 2024 में 1,175 रह गए, यानी करीब 25.4 प्रतिशत की कमी।
लेकिन आगरा के हालिया मामले यह सवाल जरूर खड़ा करते हैं कि आंकड़ों में गिरावट के बावजूद किशोर अपराध का स्वरूप कितना बदल रहा है?
आईफोन का शौक बना लूट की वजह
आगरा में दो नाबालिग भाइयों पर व्यापारी की सोने की चेन लूटने का आरोप लगा। पुलिस के अनुसार, चेन बेचकर मिले पैसे से आईफोन खरीदने की बात सामने आई। यह मामला इस बदलती मानसिकता का उदाहरण बना कि महंगे गैजेट और दिखावे की चाह किस तरह किशोरों को गलत रास्ते तक ले जा सकती है।
मोबाइल झपटमारी में किशोरों की भूमिका
आगरा में मोबाइल झपटमारी के एक मामले में भी गिरोह में नाबालिगों की कथित भूमिका सामने आई। पुलिस के अनुसार, कम उम्र होने के कारण किशोरों को रेकी और वारदात के लिए इस्तेमाल किया जाता था। यहां अपराध केवल जरूरत से नहीं, बल्कि आसान पैसा और संगठित तरीके से अपराध करने की प्रवृत्ति से जुड़ा दिखाई दिया।
खंदौली में वायरल हुए दर्जनों आपत्तिजनक वीडियो
खंदौली का मामला डिजिटल दौर के किशोर अपराध की नई तस्वीर सामने लाता है। मार्च 2026 में नाबालिग किशोर-किशोरियों से जुड़े दर्जनों आपत्तिजनक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। आगरा पुलिस के मुताबिक मामले की जानकारी मिलने के बाद मुकदमा दर्ज किया गया और वीडियो में दिखाई दे रहे दो युवकों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने बताया कि वीडियो करीब तीन महीने पुराने थे और संबंधित किशोर-किशोरियां पहले से परिचित थे।
इस मामले ने यह सवाल भी खड़ा किया कि मोबाइल और सोशल मीडिया किशोरों के हाथ में सिर्फ मनोरंजन का माध्यम हैं या गलत इस्तेमाल होने पर अपराध का नया औजार भी बन रहे हैं?
अछनेरा में सोशल मीडिया विवाद से हत्या तक
अछनेरा क्षेत्र में सामने आया हत्याकांड भी किशोरों की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। पुलिस जांच से जुड़ी रिपोर्टों के मुताबिक, सोशल मीडिया स्टेटस को लेकर शुरू हुए विवाद के बाद 16 वर्षीय किशोर की कथित भूमिका सामने आई। आरोप है कि पुरानी रंजिश के चलते युवक को सुनसान स्थान पर ले जाकर हत्या की वारदात को अंजाम दिया गया। पुलिस ने मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया और हथियार बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई।
यह मामला बताता है कि सोशल मीडिया पर शुरू होने वाला विवाद किस तरह वास्तविक जिंदगी में गंभीर हिंसा तक पहुंच सकता है।
14 साल के दोस्त की हत्या ने भी चौंकाया
आगरा के किरावली क्षेत्र में जून 2026 में 14 वर्षीय प्रिंस की हत्या के मामले में उसके हमउम्र दोस्त को आरोपी बनाया गया। पुलिस के मुताबिक दोनों के बीच गाली-गलौज को लेकर विवाद था और आरोपी किशोर ने कथित तौर पर ईंट से हमला किया। पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लेकर बाल संप्रेक्षण गृह भेजे जाने की जानकारी दी।
अपराध की वजह बदल रही है
इन घटनाओं को एक साथ देखने पर तस्वीर का एक दूसरा पहलू सामने आता है। किशोर अपराध के पीछे केवल गरीबी या मजबूरी को वजह मानना पर्याप्त नहीं होगा।
महंगे मोबाइल का आकर्षण, सोशल मीडिया पर पहचान और दिखावे की चाह, साथियों का दबाव, आपसी रंजिश, गलत संगत और डिजिटल माध्यमों का दुरुपयोग—कई अलग-अलग कारक किशोरों को अपराध की तरफ धकेलते दिखाई देते हैं।
NCRB का आंकड़ा और आगरा की जमीन
राष्ट्रीय स्तर पर 2024 में किशोर अपराध के मामलों में 11.2 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि उत्तर प्रदेश में दर्ज मामलों में करीब 25 प्रतिशत कमी आई।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश में किशोर अपराध लगातार बढ़ रहा है। लेकिन आगरा में सामने आए अलग-अलग मामलों से यह जरूर पता चलता है कि किशोरों से जुड़े अपराध के तरीके और कारण बदल रहे हैं।
एक मामले में आईफोन पाने की चाह अपराध तक ले जाती है, दूसरे में मोबाइल झपटमारी गिरोह किशोरों का इस्तेमाल करता है, कहीं सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होना विवाद का कारण बनता है और कहीं सोशल मीडिया से जुड़ी रंजिश हिंसा तक पहुंच जाती है।
असली चुनौती अपराध के बाद नहीं, अपराध से पहले
किशोर न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास भी है। इसलिए पुलिस की कार्रवाई के साथ परिवार, स्कूल और समाज की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
बच्चे के व्यवहार में अचानक बदलाव, गलत संगत, ऑनलाइन गतिविधियों में असामान्य रुचि, महंगे सामान की अचानक मांग या लगातार बढ़ता आक्रोश—इन संकेतों को समय रहते समझना जरूरी है।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किशोर ने अपराध क्यों किया। बड़ा सवाल यह है कि अपराध करने से पहले उसके आसपास मौजूद परिवार, स्कूल और समाज उसकी बदलती दिशा को क्यों नहीं पहचान पाए।
बड़ा सवाल
जिस उम्र में हाथ में किताब होनी चाहिए, उस उम्र में अगर हाथ में अपराध की योजना बनने लगे तो जिम्मेदारी सिर्फ पुलिस की नहीं है।
NCRB का आंकड़ा राष्ट्रीय स्तर की तस्वीर दिखाता है और आगरा के मामले उस तस्वीर का स्थानीय चेहरा सामने रखते हैं। जरूरत अपराध के बाद कार्रवाई की ही नहीं, बल्कि उस सोच को अपराध बनने से पहले रोकने की है।
