आगरा। बोदला-खतैना रोड की करीब 10 हजार वर्गगज बेशकीमती जमीन का विवाद अब दस्तावेजों के ऐसे खेल तक पहुंच गया है, जिसमें कभी जिंदा व्यक्ति की मौत का प्रमाणपत्र बना तो कभी दूसरे को उसका वारिस बताकर जमीन के कागज बदलने की कोशिश हुई। वर्षों पुराने इस विवाद की सीआईडी जांच आगे बढ़ी तो दस्तावेजों में दर्ज कई विरोधाभास सामने आए। जांच अधिकारी रहे सीआईडी निरीक्षक अनिल प्रताप सिंह की तहरीर पर जगदीशपुरा थाने में चार जुलाई 2026 को तीन अलग-अलग मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
इन मुकदमों में फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र जारी कराने, जमीन पर कब्जे की नीयत से दस्तावेज तैयार कराने और एक ही जमीन के अलग-अलग लोगों के साथ सौदे किए जाने के आरोप लगाए गए हैं। खास बात यह है कि जांच में सामने आए तथ्यों ने जमीन विवाद को सिर्फ कब्जे का मामला न रखकर सरकारी रिकॉर्ड और रजिस्ट्री दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
मृत्यु प्रमाणपत्र से शुरू हुआ दस्तावेजों का खेल
पहले मुकदमे में नगर निगम के सफाई नायक अजय कुमार और तत्कालीन सफाई खाद्य निरीक्षक परमानंद को आरोपी बनाया गया है। जांच में सामने आया कि जसवीर सिंह की मृत्यु 29 अक्टूबर 2021 को होने की जानकारी के आधार पर उनका मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किया गया था। बाद में नगर निगम ने सात जून 2024 को इस मृत्यु प्रमाणपत्र को निरस्त कर दिया।
जांच में दोनों कर्मचारियों की भूमिका को आपत्तिजनक बताते हुए कार्रवाई की संस्तुति की गई। इसी दस्तावेज को लेकर जमीन विवाद में कई सवाल खड़े हुए, क्योंकि जमीन से जुड़े पुराने रिकॉर्ड में जसवीर सिंह के नाम का इस्तेमाल हुआ था।
जमीन के मालिकाना हक पर खड़ा हुआ बड़ा सवाल
जांच के दौरान जमीन के मालिकाना हक और उससे जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की गई तो कई स्तरों पर विरोधाभास सामने आए। पहले फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र और वारिसान से जुड़े दस्तावेजों का मामला सामने आया था। इसके बाद जमीन के नामांतरण और उसके आधार पर तैयार कराए गए दूसरे दस्तावेज भी जांच के दायरे में आए।
जांच में यह आरोप भी सामने आया कि जसवीर सिंह के नाम जमीन का नामांतरण होने के बाद किशन मुरारी, रवि कुशवाह, राजू और बंटू ने जमीन पर अधिकार जताने की कोशिश की। दूसरे मुकदमे में आरोप है कि राजू और बंटू को गवाह बनाकर 27 जनवरी 2020 को उप निबंधक सदर पंचम के यहां मुख्तारनामा पंजीकृत कराया गया। जांच रिपोर्ट के अनुसार आरोपियों को जानकारी थी कि जसवीर सिंह जमीन के मालिक नहीं थे, इसके बावजूद जमीन पर कब्जे की नीयत से दस्तावेज तैयार कराए गए।
एक ही जमीन के कई सौदों ने बढ़ाई पेचीदगी
तीसरे मुकदमे में पंजाब के लुधियाना निवासी टहल सिंह को आरोपी बनाया गया है। जांच में 31 मार्च 1980 के डीड ऑफ डिसॉल्यूशन का उल्लेख करते हुए बताया गया कि इसके आधार पर जमीन का नामांतरण पदम कुमार जैन आदि के नाम किया गया था।
इसके बावजूद जांच रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि टहल सिंह ने बाद के वर्षों में इसी जमीन के संबंध में अलग-अलग लोगों के साथ इकरारनामे, पावर ऑफ अटॉर्नी और बैनामे किए। जांच में वर्ष 2007 में जमीन का सौदा 10 लाख रुपये में होने और वर्ष 2016 में करीब 7.49 करोड़ रुपये कीमत दर्शाते हुए बैनामा किए जाने का भी उल्लेख है।
यानी जिस जमीन के मालिकाना हक को लेकर पहले से विवाद था, उसी जमीन के अलग-अलग समय पर हुए सौदों ने पूरे मामले को और उलझा दिया।
पहले भी पुलिस की भूमिका पर उठे थे सवाल
जगदीशपुरा जमीन प्रकरण में पुलिस की भूमिका को लेकर पहले भी गंभीर सवाल उठ चुके हैं। पूर्व में हुई जांच में तत्कालीन जगदीशपुरा एसओ जितेंद्र सिंह की भूमिका भी जांच के घेरे में आई थी। एसआईटी ने उन्हें आपराधिक साजिश का आरोपी बनाया था। बिल्डर कमल चौधरी, उसके बेटे आर्यन उर्फ धीरू, पुरुषोत्तम पहलवान, भूपेंद्र पहलवान, किशोर बघेल, अमित अग्रवाल, आनंद जुरैल और नेम कुमार जैन समेत कई अन्य नाम भी जांच में सामने आए थे।
मामले में करीब 2000 पन्नों की चार्जशीट तैयार होने और डिजिटल साक्ष्य मिलने की बात भी सामने आई थी। बाद में शासन के निर्देश पर जुलाई 2024 में मामले की जांच सीबीसीआईडी आगरा सेक्टर को सौंपे जाने की जानकारी सामने आई।
अब तीन मुकदमों से फिर खुली पुरानी फाइल
चार जुलाई 2026 को दर्ज हुए तीनों मुकदमों ने वर्षों पुराने जमीन विवाद को फिर सुर्खियों में ला दिया है। एक तरफ मृत्यु प्रमाणपत्र और नामांतरण से जुड़े दस्तावेज सवालों में हैं तो दूसरी तरफ उसी जमीन के अलग-अलग लोगों के साथ किए गए सौदों की जांच सामने आई है।
पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस जमीन के कागजों में मालिकाना हक बार-बार बदलता रहा, उन दस्तावेजों को तैयार कराने और इस्तेमाल करने के पीछे आखिर कौन-कौन था? सीआईडी की जांच से जुड़े इन मुकदमों में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होना अभी न्यायिक प्रक्रिया का विषय है।
